बंद चीजें

कान कसकर बंद करने भर से
सुनाई पड़ना बंद नही होता
चीज़ें दिखती रहती हैं
आँखें बंद कर लेने पर भी
और कुछ न कुछ बोल जातें हैं
सिले हुए होंठ भी.

हम बस ढोंग करते हैं
न देखने, न सुनने
या फिर न बोलने का
और मन को समझा कर
कोशिश करते हैं ख़ुश रहने की
अपनी दुनिया में
अपनी बनाई सीमाओं में.

पर शायद
सोचना बंद हो जाता होगा
दिमाग़ बंद कर लेने से
नही तो कैसे चलता व्यापार
नफ़रत के सौदागरों का

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जब हम मिलेंगे फिर !

एक दिन कभी
शायद हम फिर मिलें
जीवन के किसी मोड़ पर
यूँ ही भटकते हुए
तब शायद हम ढोंग करें
एक-दूसरे को न जानने का.

या फिर हम पहचान लें
और थोड़ा मुस्कुरा कर कहें
“अच्छा लगा तुमसे मिलकर”
और कर के कुछ इधर-उधर क़ी बातें
अचानक कोई ज़रूरी काम याद आने कि बात कहकर
थोड़ा और मुस्कुराएंगे
और अलग होंगें कह कर
फिर से मिलने क़ी उम्मीदों के बारें में .

लेकिन ये सब कुछ
शुरू से ही झूठ होगा
यक़ीनन धोखा होगा ख़ुद से ही
उस वक़्त हमे मिलना नही पसंद आएगा,
मुस्कुराना भारी लगेगा,
बातें करना दर्द देगा
और तो और
फिर से अलग होना भी परेशान करेगा
दिल रोएगा आँसू छिपा
फिर से अलग होने क़ी बेबसी से.

लेकिन कभी नही रहा
इतना समझदार ये दिल
ये फिर से मिलना चाहता है
बातें करना और मुस्कुराना चाहता है
ज़ख़्मों को फिर से खोल-खोल कर
फिर-फिर से रोना चाहता है.

माध्यम

जब हम चुप रहते
तो बहुत कुछ बोलने का मन करता
और जब बोलना होता
तो बस चुप रह जाते.

एक दिन उसने परख लिया
कि क्या कुछ कह रहे होते हैं
हम यूँ चुप-चुप से
और क्या कुछ बेकार होता है
हमारे यूँ ही बोलने में.

अब कोई फ़र्क नही पड़ता
बोते जाने या चुप रह जाने में
शब्दों की या किसी भी माध्यम की
ज़रूरत नही होती
जब दिलों में फ़ासला न रह जाए

तुम्हारे बग़ैर

रास्तों पर मोड़ हों
तो अच्छे लगते हैं रास्ते
तुम कहते थे.
गुज़र कर सैकड़ों मोड़ों से
आज भी याद है हमें
वो सारी बातें
जो तुम कहते थे.

सुंदर सी तुम्हारी आँखें
हो जाती थीं और भी सुंदर
संजों कर ख़ुद मेँ
ढेर सारे प्यारे-प्यारे सपने

भिगो देतीं थीं
भीतर तक तुम्हारी बातें
और मंत्रमुग्ध से हम
समेटते रहते
तुम्हारी बातें
अपनी बातों मेँ,
तुम्हारे सपने
अपने सपनों मेँ,
और तुम्हारी आँखें
अपनी आँखों मेँ.

आज जब तुम नही हो
आईना दिखाता सा लगता है
हर अकेलापन
और देखते रहतें हैं
जिसमे घंटों हम
अपनी ही आँखों मेँ
अब भी खिलते,
तुम्हारे ही सपने,
उनमें डूबी हुई सी
तुम्हारी गहरी आँखें.
घेर लेती हैं हर मोड़ पर
हमें तुम्हारी यादें.

तुम्हारे बाद, अब,
कुछ भी नही बदलता
किसी भी मोड़ पर
और अच्छा नही लगता
हमें ये रास्ता
तुम्हारे बग़ैर

अगर तुम!

फूल होते अगर तुम
तो मै करता इंतज़ार
तुम्हारे खिलने का
और भर लेता तुम्हारी सुंदरता
और सुगंध अपने मन में.चाँद होते अगर तुम
तो निहारा करता देर तक
हर रात बस तुम्ही को
और महसूस करता तुम्हारी शीतलता
अपने अंतर्मन तक.

संगीत होते अगर तुम
तो सुनता और गुनगुनाता
हर पल तुम्ही को
और घुलता रहता अमृत सा
कानो में, जीवन में.
शब्द होते अगर तुम
तो दूहराता रहता हर पल तुम्हे
और शायद पसंद न करता
तुम्हारे सिवा और कुछ भी बोलना.

लेकिन ये सोच तो ग़लत है
सिरे से ही
कोई फूल, चाँद, संगीत
या शब्द न होकर
तुम केवल तुम ही हो

मैं मानता हूँ की ग़लत था मै
पर ये सच है कि तुम हमें
कभी फूल, कभी चाँद, कभी संगीत
या कभी शब्दों से,
और कभी कभी तो एक साथ
उन सब से लगे.
और माना हमने तुम्हें
हमेशा उन सबसे कुछ और ख़ास
उन सबसे कहीं अधिक प्यारा

 

 

खामोशियाँ!

खामोशियाँ!

कुछ कह जातीं हैं हमेशा
जानते थे हम
इसलिए उस दिन अचानक
जब वो मिला
तो बोलते रहे हम
दुनिया भर की बातें,
बेकार की बातें।
 
वो ख़ामोश रहा
बस सुनता रहा
और फिर चला गया
बिना कुछ कहे
बस ख़ामोशी ओढ़ कर 

 

और तब हमने जाना
कि ख़ामोशी सचमुच बोलती है
हमे छील गयीं भीतर तक
कई पुराने छुपे हुए से
ज़ख़्म फिर से खोल गयी
बचते रहे जिन बातों से हमेशा हम
उसकी ख़ामोशी
वो सबकुछ बोल गयी

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

Pighlani hogi barf

Raha karti thi
Kasmasahat si
Ubalte hue sawalon me
Akul Rahti thin urjayen
Ufan kar bah Nikalne ko
Dahaakti aag si thi
Har norm-o-skht kono men
hamne suna bhar hai

Nahi uthte sar
Tarekar aankhen barhte nahi
Ab sulagte sawal
Ag to bahut door
Ab to mahsoos nahi hoti garmi tak
kahin aas paas
Isse pahle  bahta hua lahu
Jam jaye shiraon me hi
Pighlani hogi barf