माध्यम

जब हम चुप रहते
तो बहुत कुछ बोलने का मन करता
और जब बोलना होता
तो बस चुप रह जाते.

एक दिन उसने परख लिया
कि क्या कुछ कह रहे होते हैं
हम यूँ चुप-चुप से
और क्या कुछ बेकार होता है
हमारे यूँ ही बोलने में.

अब कोई फ़र्क नही पड़ता
बोते जाने या चुप रह जाने में
शब्दों की या किसी भी माध्यम की
ज़रूरत नही होती
जब दिलों में फ़ासला न रह जाए

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4 thoughts on “माध्यम

  1. शब्दों की या किसी भी माध्यम की
    ज़रूरत नही होती
    जब दिलों में फ़ासला न रह जाए

    Wah! Bahut sunder. Bahut hi achhi lagi last ki three panktiyan… 🙂

  2. mai jitna padh rahi hun utna hi lag raha hai ki tum itna achchha likhte ho ye na jaan kar maine kitna miss kiya hai.
    waise itna sensible aadmi poet huye bina rah hi njahi sakta

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