खामोशियाँ!

खामोशियाँ!

कुछ कह जातीं हैं हमेशा
जानते थे हम
इसलिए उस दिन अचानक
जब वो मिला
तो बोलते रहे हम
दुनिया भर की बातें,
बेकार की बातें।
 
वो ख़ामोश रहा
बस सुनता रहा
और फिर चला गया
बिना कुछ कहे
बस ख़ामोशी ओढ़ कर 

 

और तब हमने जाना
कि ख़ामोशी सचमुच बोलती है
हमे छील गयीं भीतर तक
कई पुराने छुपे हुए से
ज़ख़्म फिर से खोल गयी
बचते रहे जिन बातों से हमेशा हम
उसकी ख़ामोशी
वो सबकुछ बोल गयी

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

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2 thoughts on “खामोशियाँ!

  1. ज़ख़्म फिर से खोल गयी
    बचते रहे जिन बातों से हमेशा हम
    उसकी ख़ामोशी
    वो सबकुछ बोल गयी

    Simply beautiful!
    Welcome back! Waise khamosh to tum ho gaye the kuch dino ke liye 🙂 Ab gayab huye to soch lo doston se nahi bach paoge, isliye khabardar jo gayab huye 😛

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