अगर तुम!

फूल होते अगर तुम
तो मै करता इंतज़ार
तुम्हारे खिलने का
और भर लेता तुम्हारी सुंदरता
और सुगंध अपने मन में.चाँद होते अगर तुम
तो निहारा करता देर तक
हर रात बस तुम्ही को
और महसूस करता तुम्हारी शीतलता
अपने अंतर्मन तक.

संगीत होते अगर तुम
तो सुनता और गुनगुनाता
हर पल तुम्ही को
और घुलता रहता अमृत सा
कानो में, जीवन में.
शब्द होते अगर तुम
तो दूहराता रहता हर पल तुम्हे
और शायद पसंद न करता
तुम्हारे सिवा और कुछ भी बोलना.

लेकिन ये सोच तो ग़लत है
सिरे से ही
कोई फूल, चाँद, संगीत
या शब्द न होकर
तुम केवल तुम ही हो

मैं मानता हूँ की ग़लत था मै
पर ये सच है कि तुम हमें
कभी फूल, कभी चाँद, कभी संगीत
या कभी शब्दों से,
और कभी कभी तो एक साथ
उन सब से लगे.
और माना हमने तुम्हें
हमेशा उन सबसे कुछ और ख़ास
उन सबसे कहीं अधिक प्यारा

 

 

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2 thoughts on “अगर तुम!

  1. मैं मानता हूँ की ग़लत था मै
    पर ये सच है कि तुम हमें
    कभी फूल, कभी चाँद, कभी संगीत
    या कभी शब्दों से,
    और कभी कभी तो एक साथ
    उन सब से लगे.
    और माना हमने तुम्हें
    हमेशा उन सबसे कुछ और ख़ास
    उन सबसे कहीं अधिक प्यारा

    Kya baat hai..bahut dino ke baad blog per likhna start kiye ho aur usper bhi love poem. Hmmm….expression direct from heart. kya chakkar hai sir? Tell tell… 😉

  2. और माना हमने तुम्हें
    हमेशा उन सबसे कुछ और ख़ास
    उन सबसे कहीं अधिक प्यारा

    yakinan koi aisa jo itne najdeek hota hai dil ke wo in sabse kahin jyada hota hai tabhi to log itni saari upmayen de kar bhi chain nahi paate

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